एक प्राचीन भारतीय साहित्य, “मनुस्मृति” में आचार्यों ने द्विजों को उन अशुद्धियों से  शुद्धीकरण के लिए जात कर्म संस्कार तथा चूड़ाकर्म संस्कार के लिए कहा है,जो अशुद्धियां उन्हें गर्भ में रहते हुए या जो स्पर्म तथा ओवम में ( अर्थात बीजदुष्टी) रही हैं।

यहां जातकर्म संस्कार/ नवजात शिशु की देखभाल  को एक शुद्धीकरण की प्रक्रिया के रूप में बताया है, जिसमें गर्भनाल को काटने के बाद बच्चे को आध्यात्मिक मंत्रों द्वारा सोने, शहद और विशिष्ट रूप से तैयार घी के साथ मूल्यवान जड़ी बूटियों के मिश्रण को चटाने के लिए बताया है।

आयुर्वेद ने, सोने को अपने औषधीय गुणों और विभिन्न कार्यों में उपयोग किए जाने   के कारण, खुद ही आत्मसात कर लिया है। धातुओं में इसे शुद्ध धातु के अंतर्गत वर्गीकृत किया जाता है। सोने को इसके रसायन(कायाकल्प) और वाजीकरण (कामोद्दीपक) गुणों के कारण….

१. गर्भाधान से पहले आंतरिक उपयोग के लिए दिया जाता है ताकि स्वस्थ बच्चे का जन्म हो सके।

२.गर्भाधान के बाद इसका उपयोग पुंसवन कर्म में किया जाता है।(भ्रूण के उचित अंतर गर्भाशय विकास के लिए)

३.जन्म के बाद लेहन/ पूरक आहार और जात कर्म संस्कार में सोने की प्रमुख भूमिका बताई गई है।

४. जैसे जैसे बच्चा बढ़ता है,बेहतर पाचनशक्ति और उपापचय(metabolism),शरीरशक्ति और प्रतिरक्षा(बल),मेधा बुद्धि(intelligence),वर्ण/ प्रभा/ रंग के लिए सोने को विभिन्न हर्बल दवाओं के साथ या अकेले दिए जाते देखा जा सकता है।

स्वर्ण प्राशन को सभी बच्चों में दिया जा सकता है क्योंकि यह पोषण मेटाबॉलिज्म विकास वृद्धि शारीरिक शक्ति और रोग प्रतिरक्षा को बढ़ाने के लिए कार्य करता हैं।

 

विशेष:-

क्या आपको पता है की आचार्यों ने अन्य लेहन को नित्य प्रयोज्य नहीं बताया है। परन्तु स्वर्ण से निर्मित केवल यही एक ऐसा उत्पाद है जिसे दैनिक दिए जाना एवं इससे विशिष्ट लाभ प्राप्त करने के लिए आचार्यों ने इसे एक या 6 महीने की अवधि के लिए जारी रखने के लिए निर्देशित किया है।